कहते हैं सपने देखने का हक़ सभी को है, लेकिन उन सपनों को साकार कर पाना हर किसी के बस की बात नहीं। लेकिन 2014 के बाद से लगातार प्रचंड बहुमत पाकर 2050 तक का राजनीतिक मॉडल तैयार करना और उसमें सिर्फ एक ही दल के सत्ता में बने रहने का सपना देखना यह हक़ फिलहाल सिर्फ बीजेपी को ही नज़र आता है। फ़िलहाल इस सवाल पर गहराई से सोचने से पहले यह समझना ज़रूरी है कि भारत में EVM की यात्रा शुरू हुई कब से।
EVM का इतिहास
1991: पहली बार विधानसभा चुनावों में 16 सीटों पर EVM का प्रयोग (मध्यप्रदेश, राजस्थान, दिल्ली)।
2001 तमिलनाडु, केरल, पुदुचेरी और पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनावों में EVM का पूर्ण उपयोग।
2004 लोकसभा चुनाव पहली बार पूरे देश की 543 सीटों पर EVM का इस्तेमाल।
दिलचस्प बात यह है कि 2004, 2009 और 2014 तक UPA लगातार सत्ता में रही— यानी EVM के बावजूद परिणाम किसी एक दल के पक्ष में स्थायी नहीं रहे। लेकिन 2014 के बाद NDA को जिस तरह लगातार भारी जनादेश मिलता रहा उसने विपक्ष के संदेहों को और तीखा कर दिया है।
बीजेपी के दो बड़े “फैक्टर” अक्सर चर्चा में रहते हैं—
एक: EVM सिस्टम पर भरोसा/सवाल
दूसरा: नरेंद्र मोदी का चुनावी मैनेजमेंट।
दुनिया में EVM — अमेरिका और रूस का मॉडल
अमेरिका में भारत जैसी “पूरी तरह इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन” की व्यवस्था नहीं है।
वहाँ हर राज्य अपनी चुनाव प्रणाली तय करता है—
कई जगह Direct Recording Electronic (DRE) मशीनें
* कई जगह पेपर बैलेट + ऑप्टिकल स्कैन मशीनें
* कुछ राज्यों में टचस्क्रीन सिस्टम
* कहीं पेपर ट्रेल अनिवार्य, तो कहीं नहीं
इसलिए यह कहना गलत है कि “अमेरिका बिल्कुल EVM नहीं इस्तेमाल करता”, लेकिन यह सच है कि भारत जैसा एकीकृत और पूर्ण EVM-आधारित मॉडल अमेरिका में नहीं है ।
रूस में Remote Electronic Voting (REV) यानी ऑनलाइन/इंटरनेट वोटिंग कुछ क्षेत्रों में लागू है।
2024 में 29 क्षेत्रों में यह सुविधा दी गई।
लेकिन यहाँ पारदर्शिता पर गंभीर सवाल हैं—
सिस्टम को “ब्लैक बॉक्स” कहा जाता है
स्वतंत्र ऑडिट मुश्किल
चुनाव आयोग का “Vybory 2.0” सिस्टम इंटरनेट से अलग बताया जाता है, लेकिन भरोसा कम है
यानी अमेरिका और रूस दोनों तकनीकी रूप से उन्नत होने के बावजूद पूरी तरह मशीन-आधारित मतदान को लेकर आशंकित हैं।
और यही कारण है कि भारत का EVM मॉडल भी समय-समय पर सवालों के घेरे में आता है।
अगर बीजेपी का जनादेश इतना ही प्रबल है तो बैलेट पेपर से चुनाव क्यों नहीं?
लोकतंत्र में जीत से बढ़कर पारदर्शिता का महत्व है। यदि वाकई देश का बहुमत एक दल के साथ है, तो बैलेट पेपर की वापसी से डर कैसा? आज सवाल ज्यादा चुनाव आयोग, सरकारी तंत्र और चुनावी प्रक्रियाओं की निष्पक्षता पर उठते हैं—
क्या सरकारी संस्थाओं का दुरुपयोग हो रहा है?
क्या विपक्ष को बराबरी का मैदान मिलता है?
क्या चुनाव प्रक्रिया जनता के भरोसे से बड़ी हो गई है?
यदि किसी भी स्तर पर धांधली हो रही है, जैसा विपक्ष बार-बार आरोप लगाता है, तो फिर बड़े दलों को ऐसे चुनावों का खुलकर बहिष्कार करना चाहिए।
लेकिन सच्चाई यह भी है कि कोई दल पूरी तरह दूध का धुला नहीं किसी के पास ताकत है तो कोई अपनी कमजोरी को राजनीतिक हथियार बना लेता है।
सबसे बड़ा खतरा — जनता का अधिकार कमजोर होना
मतदान सिर्फ एक प्रक्रिया नहीं ? यह जनता का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक अधिकार है।अगर यही अधिकार संदिग्ध होता गया, तो परिणाम सिर्फ “गलत सरकारें” नहीं होंगी, बल्कि भविष्य का वह भयावह दौर भी दिखाई दे सकता है जब
सत्ता आलोचकों के व्यक्तित्व पर प्रहार करेगी,जनता को अपनी पसंद दिखाने का मौका भी सीमित हो जाएगा और लोकतंत्र अपने मूल स्वरूप से दूर होता जाएगा।
जब जनता का वोट कमजोर पड़ता है,तब लोकतंत्र नहीं, केवल सत्ता मजबूत होती है। यही होगा तब जब दल अपने सपने साकार करने की दिशा में बढ़ोतरी करती रहेंगी 2050 का मॉडल अपने अनुसार लाएंगी।