उत्तराखंड का औद्योगिक नक्शा बीते दो दशकों में तेजी से फैला है। सिडकुल से लेकर हरिद्वार, रुड़की, पंतनगर और देहरादून जैसे औद्योगिक क्षेत्रों में हजारों छोटी-बड़ी फैक्ट्रियां स्थापित हुईं। इन उद्योगों ने रोजगार का वादा तो किया, लेकिन जमीनी हकीकत आज मजदूरों के लिए एक नए किस्म की गुलामी जैसी बन चुकी है। लेबर एक्ट में हाल के वर्षों में किए गए बदलावों ने न केवल श्रमिकों की सुरक्षा को कमजोर किया है, बल्कि फैक्ट्रियों को मनमानी करने की खुली छूट भी दे दी है।
पहले जहां लेबर इंस्पेक्टर द्वारा औचक निरीक्षण की व्यवस्था थी, वहीं अब इस प्रक्रिया को लगभग समाप्त कर दिया गया है। पहले अचानक फैक्ट्रियों का निरीक्षण होने से मालिकों में डर बना रहता था कि कहीं नियमों का उल्लंघन पकड़ा न जाए। लेकिन अब निरीक्षण “पूर्व सूचना” के तहत किए जाते हैं, जिससे कंपनियां पहले से तैयारी कर लेती हैं और सारा सिस्टम दिखावटी रूप में सही नजर आता है। इस बदलाव का सीधा असर मजदूरों के हक पर पड़ा है।
ठेकेदारी प्रथा ने छीनी स्थिरता और सम्मान
उत्तराखंड की ज्यादातर इंडस्ट्रीज अब स्थायी मजदूर रखने से बचती हैं। इसके बजाय ठेकेदारी प्रणाली को अपनाया जा रहा है। ठेकेदार मजदूरों की भर्ती करते हैं, लेकिन उनका असली फायदा कंपनियों को होता है। ठेकेदार मजदूरों से कंपनी के बराबर काम तो करवाते हैं, लेकिन वेतन का एक बड़ा हिस्सा खुद रख लेते हैं। परिणामस्वरूप, मजदूरों को सरकार द्वारा तय न्यूनतम मजदूरी भी पूरी नहीं मिल पाती।
जहां सरकार ने औद्योगिक मजदूर का न्यूनतम मासिक वेतन लगभग ₹15,000 तय किया है, वहीं ठेकेदारों के माध्यम से काम करने वाले मजदूरों को सिर्फ ₹10,000 से ₹12,000 तक ही दिया जा रहा है। इससे उनका परिवार चलाना मुश्किल हो गया है। दिनभर फैक्ट्री में 8 से 10 घंटे खपाने के बावजूद मजदूर अपने बच्चों की पढ़ाई, घर का किराया और रसोई का खर्च पूरा नहीं कर पाते।
ओवरटाइम का भुगतान बना मजाक
कई फैक्ट्रियों में मजदूरों को 8 घंटे की शिफ्ट से ज्यादा काम करवाया जा रहा है। ओवरटाइम के लिए अतिरिक्त भुगतान देने की जगह, कंपनियां उसे “एक ही शिफ्ट” का हिस्सा बता देती हैं। मजदूर मजबूर होकर चुप रहते हैं, क्योंकि ठेकेदार की नाराजगी का मतलब अगले दिन काम से निकाल दिया जाना हो सकता है।
राज्य के कई उद्योग क्षेत्रों में मजदूरों ने नाम न बताने की शर्त पर बताया कि उन्हें प्रतिदिन 12 घंटे तक काम करवाया जाता है, लेकिन वेतन केवल 8 घंटे का ही दिया जाता है। कुछ मामलों में तो रविवार की छुट्टी भी नहीं मिलती, और शिकायत करने पर ठेकेदार उन्हें “ब्लैकलिस्ट” कर देता है।
लेबर इंस्पेक्टर की भूमिका कमजोर
लेबर एक्ट में संशोधन के बाद लेबर इंस्पेक्टर की भूमिका लगभग औपचारिक रह गई है। अब निरीक्षण के लिए डिजिटल फॉर्म और पूर्व अनुमोदन की आवश्यकता होती है, जिससे निरीक्षण की गोपनीयता खत्म हो गई है। पहले जहां अचानक फैक्ट्री में पहुंचकर नियमों की जांच की जाती थी, अब कंपनियों को पहले से पता होता है कि निरीक्षण कब होना है।
इस बदलाव का नतीजा यह है कि कंपनियां कागजों में सब कुछ सही दिखा देती हैं। दस्तावेजों पर हस्ताक्षर मजदूरों से दबाव में करवा लिए जाते हैं। श्रम विभाग के पास भी कर्मचारियों की सीमित संख्या है, जिससे हर फैक्ट्री की निगरानी करना संभव नहीं हो पाता।
मजदूरों की जमीनी हकीकत
सेलाकुई औद्योगिक क्षेत्र में काम करने वाले एक मजदूर ने बताया, “हम लोग सुबह 8 बजे से रात 8 बजे तक काम करते हैं। एक छुट्टी भी नहीं मिलती। ठेकेदार कहता है अगर छुट्टी ली तो अगले महीने से काम बंद।” इतना ही नहीं, बीमार पड़ने पर कोई मेडिकल सुविधा भी नहीं दी जाती। कुछ फैक्ट्रियों में तो ईएसआई और पीएफ कटौती की भी व्यवस्था नहीं है।
इस तरह मजदूरों की जिंदगी ‘जीविका से अधिक जीवट’ बन गई है। 12000 रुपये के वेतन में वह खाएं या बच्चों को पढ़ाएं—यह सबसे बड़ा सवाल है।
सरकार और श्रम विभाग की जिम्मेदारी
मजदूरों की हालत देखकर यह सवाल उठता है कि आखिर सरकार के श्रम सुधार किसके लिए किए गए थे? क्या इन सुधारों का उद्देश्य उद्योगों को बढ़ावा देना था या मजदूरों की सुरक्षा सुनिश्चित करना? अगर निरीक्षण की प्रक्रिया पारदर्शी बनाना था, तो उसे पूरी तरह समाप्त क्यों कर दिया गया?
विशेषज्ञों का मानना है कि औद्योगिक विकास तभी टिकाऊ हो सकता है जब उसमें श्रमिकों की भागीदारी और सुरक्षा सुनिश्चित की जाए। मजदूर अगर असंतुष्ट रहेंगे तो उत्पादन की गुणवत्ता और स्थिरता दोनों पर असर पड़ेगा।
आवश्यक है सख्त निगरानी और पारदर्शिता
आज जरूरत है कि राज्य सरकार श्रम कानूनों की निगरानी फिर से सख्त करे। औचक निरीक्षण की व्यवस्था दोबारा शुरू की जाए, ठेकेदारी प्रथा के दुरुपयोग पर अंकुश लगाया जाए और मजदूरों को समय पर पूरा वेतन मिले इसकी गारंटी दी जाए।
अगर मजदूरों को न्याय नहीं मिला, तो औद्योगिक विकास का यह मॉडल केवल आंकड़ों तक ही सीमित रहेगा। मजदूर ही हर उद्योग की रीढ़ हैं, और जब रीढ़ कमजोर होगी, तो विकास की इमारत भी कभी मजबूत नहीं हो पाएगी।