राजधानी देहरादून में निजी अस्पतालों की लापरवाही के मामले दिन-ब-दिन बढ़ते जा रहे हैं। इलाज के नाम पर मरीजों की ज़िंदगी से खिलवाड़ अब अपवाद नहीं बल्कि एक खतरनाक चलन बनता जा रहा है। बीते कुछ वर्षों में ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जिन्होंने निजी अस्पतालों की कार्यशैली और सरकारी निगरानी दोनों पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
कुछ समय पहले प्रसव के दौरान एक महिला के पेट में टॉवेल छोड़े जाने की घटना ने पूरे प्रदेश को झकझोर दिया था, जिसमें महिला की मौत हो गई। वहीं राजधानी के कई नामी-गिरामी निजी अस्पतालों में गलत दवा और इंजेक्शन देकर मरीजों को अधमरी हालत में रिफर करने जैसे सैकड़ों मामले सामने आ चुके हैं।
इसी कड़ी में मैक्स अस्पताल का एक गंभीर मामला** निजी अस्पतालों की लापरवाही का बड़ा उदाहरण है। जानकारी के अनुसार, सर्जरी से पहले की जा रही जांच के दौरान एक महिला अचानक कोमा में चली गई। कुछ समय बाद इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई। परिजनों का आरोप था कि यह पूरी तरह डॉक्टरों की लापरवाही का नतीजा था। इस मामले में पीड़ित परिवार ने वर्ष 2014 में उपभोक्ता फोरम** में केस दर्ज कराया। लंबी कानूनी लड़ाई के बाद 2025 में उपभोक्ता फोरम ने परिजनों के पक्ष में फैसला सुनाया , जिसमें डॉक्टरों की लापरवाही स्पष्ट रूप से सामने आई। यह फैसला बताता है कि निजी अस्पतालों में लापरवाही कोई कल्पना नहीं, बल्कि कड़वी सच्चाई है।
इन सभी मामलों की जड़ में निजी अस्पतालों में चल रही ठेकेदारी प्रथा है। आज अस्पताल सेवा का केंद्र नहीं बल्कि व्यवसाय बन चुके हैं। बड़ी-बड़ी इमारतें खड़ी कर, MBBS डिग्रीधारी डॉक्टरों को हायर कर, अस्पतालों का संचालन व्यापारी मानसिकता से किया जा रहा है। मुनाफ़े की दौड़ में डॉक्टर जैसे जिम्मेदार पेशे की गरिमा को ताक पर रख दिया गया है।
कई जगह हालात यह हैं कि भारी भरकम फीस देकर बने डॉक्टर, जिन्हें पर्याप्त अनुभव तक नहीं होता, उनसे बड़ी-बड़ी सर्जरी करवाई जा रही हैं। वहीं कुछ मेडिकल कॉलेज मरीजों को डॉक्टरों की लंबी सूची दिखाकर आकर्षित करते हैं, लेकिन इलाज इंटर्न या प्रशिक्षु छात्रों से करवाया जाता है। मरीजों को बिना जानकारी दिए उन पर प्रयोग किए जाते हैं, मानो वे अभ्यास की वस्तु हों।
सबसे गंभीर पहलू यह है कि डॉक्टरों और अस्पतालों की लापरवाही पर कार्रवाई के लिए सरकारी तंत्र के पास आज भी कोई त्वरित और प्रभावी नीति नहीं है। एक आम व्यक्ति के लिए गलत इलाज के खिलाफ न्याय पाना बेहद कठिन और लंबी प्रक्रिया बन चुका है।
डॉक्टर या निजी अस्पताल की लापरवाही पर कार्रवाई कैसे कराएं (संक्षेप में)
1. राज्य मेडिकल काउंसिल / NMC में शिकायत
डॉक्टर के खिलाफ उत्तराखंड मेडिकल काउंसिल या नेशनल मेडिकल कमीशन में शिकायत दर्ज कराई जा सकती है।
2. मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) को शिकायत
जिले के CMO कार्यालय में लिखित शिकायत देकर जांच की मांग करें।
3. उपभोक्ता फोरम (Consumer Court)
गलत इलाज को “सेवा में कमी” मानते हुए जिला, राज्य या राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग में केस किया जा सकता है।
4. पुलिस में FIR
गंभीर लापरवाही या मृत्यु के मामलों में IPC की धाराओं में मुकदमा दर्ज कराया जा सकता है।
5. स्वास्थ्य विभाग से अस्पताल की जांच
अस्पताल का लाइसेंस, रजिस्ट्रेशन और मानकों की जांच कराकर उसे निलंबित या रद्द कराया जा सकता है।
मैक्स अस्पताल जैसे मामलों में सालों बाद मिला न्याय यह साबित करता है कि निजी अस्पतालों की लापरवाही वास्तविक और गंभीर समस्या है। ज़रूरत इस बात की है कि ठेकेदारी प्रथा पर रोक लगे, अस्पतालों पर सख्त निगरानी हो और आम मरीज को त्वरित व सस्ता न्याय मिले। इलाज व्यापार नहीं, जिम्मेदारी है
—यह बात सिस्टम को समझनी ही होगी।
प्रतीक पाठक ( स्वतंत्र पत्रकार)