बिहार का दंगल सिर्फ एक चुनाव नहीं, बल्कि जनता की आत्मा का सवाल है।
देश के तीसरा सबसे अधिक जनसंख्या वाले राज्यों में शामिल बिहार आज भी अपनी पहचान तलाश रहा है — वही बिहार जो स्वतंत्रता का सबसे बड़ा प्रहरी रहा 1912 में अंग्रेजों ने बिहार को बंगाल से अलग कर इसे एक स्वतंत्र राज्य का दर्जा दिलाया था वही बिहार जिसने जयप्रकाश नारायण से लेकर कर्पूरी ठाकुर तक देश को नेतृत्व दिया, और वही बिहार जो आज भी “पलायन”, “बेरोज़गारी” और “गरीबी” के प्रतीक के तौर पर जाना जाता है।
कभी लालू यादव के शासन को ‘जंगलराज’ कहा गया, तो नीतीश कुमार ने उस दौर को ‘सुशासन’ में बदलने का दावा किया। सच यह भी है कि नीतीश कुमार ने बिहार को हिंसा और भय के माहौल से निकालकर स्थिरता दी लेकिन वक्त के साथ वही स्थिरता अब ठहराव में बदल गई है।
जनता अब यह महसूस करने लगी है कि “सुशासन बाबू” का शासन अब थकान में तब्दील हो गया है। मंच पर नीतीश की हरकतें, बेतुके बयान और गठबंधन की बार-बार बदलती कहानी यह दर्शाती है कि अब उनका राजनीतिक सूर्य अस्ताचल की ओर बढ़ रहा है।
नीतीश आज भले ही NDA के साथ अपनी स्थिति को ‘कम्फर्ट ज़ोन’ में दिखाने की कोशिश कर रहे हों, लेकिन भाजपा उनके कंधे पर सवार होकर अब खुद के मुख्यमंत्री का सपना देखने लगी है। पार्टी की रणनीति साफ है इस बार बिहार की राजनीति ‘जुगाड़’ नहीं, ‘जनादेश’ से तय होगी।
इसी बीच एक तीसरी आवाज़ बिहार की ज़मीन से उठ रही है — प्रशांत किशोर की।
राजनीतिक दिमाग से रणनीतिकार और दिल से बिहारी, प्रशांत किशोर अब जनस्वराज पार्टी के ज़रिए वही कोशिश कर रहे हैं जो कभी दिल्ली में अरविंद केजरीवाल ने की थी — जनता को मुद्दों से जोड़ने की।
न बिजली, न सड़क, न पानी — बल्कि “सिस्टम की सच्चाई” को जनता के बीच रखने की।
वे बिहार के गांव-गांव जाकर कहते हैं — “जब तक जनता राजनीति को ठेके पर देगी, तब तक बिहार का ठेका दूसरों के हाथ में रहेगा।”
उनकी यह बात हर उस प्रवासी मजदूर के दिल में उतर जाती है जो मुंबई, दिल्ली या पंजाब में रोटी कमाने निकला है लेकिन दिल में अब भी “हमरा गांव, हमरा बिहार” बसा है।
प्रशांत किशोर का आंदोलन किसी पार्टी दफ्तर से नहीं, जनता के बीच से जन्मा है।
वे न भाषणबाज हैं, न लुभावने वादे करते हैं — वे उस बिहार की बात करते हैं जो राजनीति की भीड़ में कहीं खो गया है।
बिहार का युवा जो अब राजनीति से मोहभंग हो चुका है, उसे पीके में एक नई उम्मीद दिखती है — जैसे कभी दिल्ली का युवा केजरीवाल में देखा था।
यह सही है कि राजनीति केवल नीयत से नहीं, नेटवर्क से भी चलती है — और प्रशांत किशोर के पास दोनों हैं।
उन्होंने 2014 में बीजेपी की डिजिटल कैंपेन से लेकर ममता बनर्जी, जगन मोहन रेड्डी और यहां तक कि कांग्रेस तक के लिए रणनीति बनाई। लेकिन आज वे किसी पार्टी के लिए नहीं, अपने राज्य के लिए काम कर रहे हैं।
बिहार का राजनीतिक परिदृश्य अब त्रिकोणीय होता जा रहा है —
एक तरफ महागठबंधन, दूसरी तरफ NDA और तीसरी तरफ वह लहर जो धीरे-धीरे जनता के बीच उठ रही है जनस्वराज की लहर।
शायद अभी यह कहना जल्दबाज़ी होगी कि “क्या प्रशांत किशोर दूसरे केजरीवाल बनेंगे
लेकिन यह जरूर कहा जा सकता है कि अगर बिहार ने अपने दर्द को आवाज़ दी, तो पीके उसका चेहरा बन सकते हैं।
बिहार के लोग भले रोज़ी-रोटी के लिए देशभर में बिखरे हों, पर एक दिन वे अपने राज्य के भविष्य के लिए जरूर एकजुट होंगे — और उस दिन शायद बिहार फिर से ‘जागेगा’।
प्रतीक पाठक , स्वतंत्र पत्रकार